उत्तराखंडऋषिकेश

प्रकृति सुरक्षित रहेगी तभी संस्कृति और संतति भी सुरक्षित रहेगी

*✨पर्यावरण संरक्षण वर्तमान युग की बौद्धिक और आध्यात्मिक पुकार*

*✨प्रकृति, केवल संसाधन नहीं, सह-अस्तित्व का प्रतीक*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश। आज हम एक ऐसे युग में खड़े हैं जहाँ तकनीक की तीव्रता, भौतिकता की प्रबलता और उपभोग की मानसिकता ने मानव चेतना को विभाजित कर दिया है। एक ओर हमने विज्ञान, संचार और वैश्वीकरण के माध्यम से अभूतपूर्व उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, वहीं दूसरी ओर हमने प्रकृति से अपना संबंध शिथिल कर लिया है इसलिये अब समय आ गया है कि हम प्रकृति, संस्कृति और संतति तीनों के संरक्षण के लिये मिलकर कदम बढ़ाये।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, वनों की कटाई, और प्रदूषण जैसे संकट केवल पर्यावरणीय विषय नहीं हैं, ये दार्शनिक और नैतिक प्रश्न बन चुके हैं। प्रकृति हमारे लिए केवल संसाधन नहीं है, वह हमारा सह-जीवन है। ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर उपनिषदों की शिक्षाओं तक, भारतीय मनीषा ने प्रकृति को ऋत अर्थात् ब्रह्मांडीय संतुलन के रूप में देखा है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आज पर्यावरण की रक्षा केवल एक वैज्ञानिक दायित्व नहीं, एक आध्यात्मिक कर्तव्य बन चुका है। यह जीवनदृष्टि हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ हमारा संबंध उपभोग का नहीं, उत्तरदायित्व का होना चाहिए।

भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा “संस्कार” है ऐसा आचरण जो आत्मा को शुद्ध करे, समाज को समरस करे और जगत को संतुलित रखे। संस्कृति हमारे जीने का ढंग है, वह मार्गदर्शक चेतना जो हमें “स्व” से “समष्टि” की ओर ले जाती है।

आज जब संस्कृति को केवल वस्त्रों, खानपान या भाषाई अभिव्यक्तियों तक सीमित कर दिया गया है, तब उसका गूढ़ दार्शनिक पक्ष खोता जा रहा है। हमारी संस्कृति में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा ही नहीं, बल्कि कर्तव्य, संयम और दायित्व भी है और वर्तमान समय में सबसे बड़ा दायित्व पर्यावरण का संरक्षण है। हम यह धरती अगली पीढ़ी से उधार में ले रहे हैं, इस दृष्टि से जीवन जीना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

वर्तमान समय की पर्यावरणीय समस्याओं का वास्तविक समाधान तब उत्पन्न होता है जब हम समस्या को केवल विश्लेषणात्मक दृष्टि से नहीं, समग्र दृष्टि से देखें। प्रकृति, संस्कृति और संतति तीनों एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। यदि हम केवल वृक्षारोपण करें लेकिन उपभोग की वृत्ति न बदलें, यदि हम संस्कृतिक उत्सव मनाएँ लेकिन व्यवहार में मूल्य न हों, या यदि हम शिक्षा दें परंतु उसमें करुणा न हो तो ये सब सतही प्रयास रहेंगे इसलिये हमें प्रकृति, संस्कृति व संतति के प्रति समग्र दृष्टिकोण निर्मित करना होगा क्योंकि सजग नागरिक, संस्कारित समाज से ही संतुलित सृष्टि विकसित होगी।

वर्तमान समय में हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है चेतना का जागरण। जब तक हम केवल बाह्य क्रिया करते रहेंगे और अंतरात्मा में परिवर्तन नहीं लाएँगे, तब तक हमारा कोई भी प्रयास टिकाऊ नहीं हो सकता। प्रकृति की रक्षा, संस्कृति की पुनर्स्थापना और संतति के सुखद भविष्य के निर्माण का मार्ग केवल बाह्य उपायों से नहीं, आंतरिक रूपांतरण से ही संभव है।

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