ऋषिकेश

जीवन में सौंदर्य और संतुलन का प्रतीक है वैशाखी -: स्वामी चिदानंद सरस्वती

*बैसाखी, धरती से जुड़े आध्यात्मिक मूल्यों का उत्सव*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश। ऋतुओं के चक्र में जब वसंत अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है और धरती अन्न से भर उठती है, तब भारत के हृदय में प्रकृति के सम्मान हेतु एक उत्सव जन्म लेता है वह है बैसाखी। यह पर्व फसल कटाई और धान्य से समृद्ध धरती का उत्सव है, यह प्रकृति के प्रति आभार, मेहनतकश किसानों के प्रति सम्मान और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के अभिनन्दन का शुभ दिन है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा कि प्रकृति के साथ हमारा संबंध केवल भौतिक नहीं, आत्मिक भी है। बैसाखी इसी आत्मिक संबंध का महोत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जैसे धरती बिना भेदभाव के सबको अन्न देती है, वैसे ही हमें भी अपने कर्मों में निस्वार्थता, सेवा और करुणा से युक्त व्यवहार करना चाहिये।

आज के यांत्रिक जीवन में हमें प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, बैसाखी जैसे पर्व हमें पुनः प्रकृति की ओर लौटने का अवसर देते हैं। बैसाखी खेतों में लहराती फसल के मनोरम दृश्य के साथ ही जीवन में संतुलन और सौंदर्य का प्रतीक भी है।

स्वामी जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान की युवा पीढ़ी भारत की नई दिशा और दशा तय करने वाली है। तकनीक, विज्ञान और डिजिटल युग के साथ आगे बढ़ते हुए भी हमें अपने मूल व मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए। बैसाखी हमें यह सिखाती है कि जितना महत्वपूर्ण तकनीकी विकास है, उतना ही आवश्यक प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहना भी है। बैसाखी का संदेश है कि धरती माता को समझो, सहेजो और पर्यावरण संरक्षण को जीवनशैली बनाओ।

हम जितना प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर जीवन जीते हैं, उतना ही हम भीतर से शुद्ध और संतुलित होते हैं। बैसाखी, आर्थिक समृद्धि के साथ वास्तविक और आत्मिक समृद्धि का भी प्रतीक है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य कराती है।

आज, जब पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बातें आम हो चुकी हैं, ऐसे में बैसाखी जैसे पर्व हमें एक नई सोच, नई दिशा देते हैं। यह केवल अतीत की परंपरा नहीं, वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की आशा भी है। प्रकृति को हम जीवन के उपभोग की दृष्टि से न देखें, बल्कि उसे साधना और सेवा की दृष्टि से देखें। बैसाखी केवल भजन-कीर्तन, गिद्दा और भंगड़ा तक सीमित न रहे, वह एक आत्मिक जागृति का माध्यम बने, यही इस दिव्य पर्व का संदेश है।

बैसाखी पर्व धरती माता को नमन, किसानों की मेहनत का सम्मान और जीवन में संतुलन स्थापित करने का सच्चा उत्सव है। जो भारत को आध्यात्मिक और पर्यावरणीय समृद्धि की ओर ले जा सकता है।

स्वामी जी ने कहा कि बैसाखी का उत्सव सामूहिकता और समरसता का उत्सव है। गुरुगोविंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना भी इसी दिन हुई थी, जो हमें धर्म, साहस और सेवा का मार्ग दिखाती है। यह पर्व सभी धर्मों, समुदायों और संस्कृतियों को जोड़ने का कार्य करता है।

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