संस्कारों से सशक्त पीढ़ी, संस्कृति से समृद्ध राष्ट्र का निर्माण जरूरी: स्वामी चिदानन्द सरस्वती
परमार्थ निकेतन में गुजरात से आए श्रद्धालुओं के लिए सत्संग शिविर आयोजित, सनातन मूल्यों, गुरुकुल परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश
ऋषिकेश माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में स्वामी नारायण गुरुकुल, अहमदाबाद सहित गुजरात से आए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के लिए सत्संग शिविर का आयोजन किया गया। आध्यात्मिक वातावरण, मंत्रोच्चार और सनातन संस्कृति के संदेशों के बीच आयोजित शिविर में श्रद्धालुओं ने संस्कार, संस्कृति, साधना और जीवनमूल्यों के महत्व को समझा।

परमार्थ निकेतन के पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि **संस्कार वह विरासत हैं, जो पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं, संस्कृति वह चेतना है, जो समाज को दिशा देती है और सत्संग वह सेतु है, जो व्यक्ति को स्वयं से तथा समाज को अपने मूल्यों से जोड़ता है।** उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक चेतना, संस्कारों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में निहित है। भारत ने विश्व को ज्ञान, परंपराओं और जीवन को देखने की व्यापक दृष्टि प्रदान की है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आज आवश्यकता केवल शिक्षित पीढ़ी तैयार करने की नहीं, बल्कि संस्कारित, संवेदनशील, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिकों के निर्माण की है। नई पीढ़ी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक में दक्ष होने के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ी रहे। उन्होंने कहा कि जिस शिक्षा में ज्ञान तो हो, लेकिन करुणा न हो; सफलता तो हो, लेकिन संवेदना न हो; और तकनीक तो हो, लेकिन नैतिकता न हो, वह शिक्षा अधूरी है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाना, समाज के प्रति उत्तरदायित्व जगाना और मानवता के प्रति सेवा एवं समर्पण का भाव विकसित करना है।
गुरुकुल परंपरा संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण का आधार
स्वामी जी ने गुरुकुल परंपरा को भारतीय शिक्षा व्यवस्था की विशिष्ट पहचान बताते हुए कहा कि इसमें ज्ञान के साथ विनय, सामर्थ्य के साथ सेवा, अधिकारों के साथ कर्तव्य और प्रगति के साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को महत्व दिया जाता है। यही संतुलन व्यक्ति को योग्य नागरिक और समाज को सशक्त राष्ट्र बनाता है।
श्री संतवल्लभ दास जी स्वामी के श्रीमुख से गंगा तट पर आयोजित सत्संग में परंपरा और भविष्य के बीच समन्वय का संदेश दिया गया। माँ गंगा की अविरल धारा का उदाहरण देते हुए कहा गया कि जीवन का सौंदर्य अपनी मूल पहचान को सुरक्षित रखते हुए निरंतर आगे बढ़ने में है। जिस प्रकार गंगा विभिन्न प्रदेशों और संस्कृतियों को जोड़ती हैं, उसी प्रकार सनातन संस्कृति विविधताओं को आत्मसात कर एकता और सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करती है।
प्रकृति संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाने का आह्वान
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने पर्यावरण संरक्षण और भारतीय जीवनमूल्यों की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि सत्संग से प्राप्त प्रेरणा को आश्रम तक सीमित न रखें, बल्कि घर-परिवार, शिक्षण संस्थानों और समाज तक पहुँचाएँ।
उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना ही नहीं, बल्कि सहानुभूति, अनुशासन, सत्यनिष्ठा और सेवा का महत्व भी सिखाना चाहिए। सफलता के साथ विनम्रता, तकनीक के साथ विवेक और अपनी परंपराओं पर गर्व के साथ करुणा, समावेशिता तथा विश्वबंधुत्व की भावना भी बनाए रखना आवश्यक है।
परमार्थ निकेतन में आयोजित इस सत्संग शिविर ने श्रद्धालुओं को भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना, नैतिक शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी।

