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गंगोत्री धाम में दिव्य गंगा आरती, स्वामी चिदानन्द सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती ने की राष्ट्र की सुख-समृद्धि की कामना

गंगोत्री धाम/उत्तरकाशी। मां गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री धाम में दिव्य गंगा आरती का आयोजन श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण के बीच किया गया। इस अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी ने मां गंगा के दर्शन और पूजन कर भारत की सुख-समृद्धि, शांति, सद्भाव तथा उत्तराखंड की खुशहाली के लिए प्रार्थना की।

गंगा तट पर मंत्रोच्चार और आरती के दीपों से वातावरण भक्तिमय हो उठा। हिमालय की शांत वादियों के बीच आयोजित आरती में मां गंगा के प्रति श्रद्धा और प्रकृति के संरक्षण का संदेश दिया गया।

इस दौरान संत मुरलीधर जी के श्रीमुख से चल रही रामचरितमानस कथा में स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और साध्वी भगवती सरस्वती जी का पावन सान्निध्य भी प्राप्त हुआ। गंगा तट, मानस कथा और हिमालय की दिव्य वादियों के संगम ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान की।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की जीवनधारा, आस्था, संस्कृति और सनातन चेतना की प्रतीक हैं। गंगा आरती केवल दीप प्रज्वलित करने की परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, जल के प्रति सम्मान और जीवन के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम है।

उन्होंने कहा कि गंगोत्री धाम में गंगा आरती की परंपरा को आगे बढ़ाना आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी है। परंपराएं तभी जीवंत रहती हैं, जब नई पीढ़ी उनके आध्यात्मिक संदेश और जीवन-मूल्यों को समझकर उन्हें अपनाती है।

साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि मां गंगा बिना किसी भेदभाव के सभी को जीवन प्रदान करती हैं। उनकी अविरल धारा सेवा, करुणा, त्याग और समर्पण का संदेश देती है। उन्होंने सनातन संस्कृति के मूल भाव ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान केवल उसके तीर्थों और मंदिरों से ही नहीं, बल्कि हिमालय, नदियों, प्राकृतिक संपदा और स्थानीय संस्कृति से भी जुड़ी है। देवभूमि की समृद्धि के लिए नदियों की निर्मलता, हिमालय की हरियाली, तीर्थस्थलों की पवित्रता और स्थानीय परंपराओं का संरक्षण आवश्यक है।

कार्यक्रम के दौरान मां गंगा के श्रीचरणों में राष्ट्र की समृद्धि, उत्तराखंड की खुशहाली और सनातन संस्कृति के संरक्षण

की कामना की गई।

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