ऋषिकेश

मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाकर ऋषिकुमारों ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन गुरुकुल में ऋषिकुमारों के लिए भगवान श्री गणेश की पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में ऋषिकुमारों ने प्राकृतिक मिट्टी से भगवान श्री गणेश की सुंदर प्रतिमाएं तैयार कीं। इस पहल के माध्यम से सनातन संस्कृति में निहित प्रकृति प्रेम, संवेदनशीलता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया।

परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि श्री गणेश विघ्नहर्ता होने के साथ बुद्धि और विवेक के प्रतीक हैं। ऐसी बुद्धि आवश्यक है, जो विकास और विनाश के बीच का अंतर समझने के साथ प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलना सिखाए। उन्होंने कहा कि बच्चों द्वारा अपने हाथों से मिट्टी को आकार देकर गणेश प्रतिमा बनाना केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के विचार को भी संस्कारों में उतारने का माध्यम है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति हमारी वस्तु नहीं, बल्कि हमारी विरासत है। जल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है और धरती आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाकर उसी मिट्टी को सम्मानपूर्वक प्रकृति में लौटाने की परंपरा भारतीय जीवन-दृष्टि में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।

कार्यशाला में ऋषिकुमारों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ प्राकृतिक मिट्टी को विभिन्न आकार दिए। उन्होंने गणेशजी की सूंड, कान, मुकुट और अन्य अंगों को अपने हाथों से आकार देकर प्रतिमाओं को स्वरूप प्रदान किया। इस दौरान उनकी सृजनशीलता के साथ प्रकृति के प्रति आत्मीयता भी दिखाई दी।

कार्यशाला के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि ऐसे उत्सव मनाए जाएं, जिनमें आस्था और आनंद के साथ पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। प्राकृतिक मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं पर्यावरण के प्रति संवेदनशील उत्सव की दिशा में प्रेरणादायी पहल के रूप में सामने आईं।

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