सनातन चेतना से अंतरिक्ष के अनंत आकाश तक भारत की गौरवगाथा
ऋषिकेश। राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों, अभियंताओं, तकनीशियनों, शोधकर्ताओं और अंतरिक्ष अभियान से जुड़े सभी कर्मयोगियों को हार्दिक बधाई एवं अभिनंदन किया।
परमार्थ निकेतन की ओर से कहा गया कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल विज्ञान और तकनीक की उपलब्धियों की कहानी नहीं, बल्कि उस देश की जिज्ञासा और ज्ञान परंपरा की निरंतर यात्रा है, जिसने हजारों वर्षों से आकाश, नक्षत्रों, सूर्य और चंद्रमा के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस भारत के चंद्र अभियान की ऐतिहासिक सफलता और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता का उत्सव भी है। चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफलतापूर्वक उतरने वाला पहला देश बनाया। इस उपलब्धि ने भारतीय वैज्ञानिकों की तकनीकी दक्षता, धैर्य, संकल्प और टीम भावना को विश्व पटल पर स्थापित किया।
परमार्थ निकेतन ने कहा कि आधुनिक विज्ञान और सनातन चेतना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सनातन परंपरा की मूल भावना जिज्ञासा, सत्य की खोज और अज्ञात को जानने की प्रेरणा में निहित है। ऋग्वेद की प्रार्थना “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” का भाव भी चारों दिशाओं से श्रेष्ठ विचारों के स्वागत का संदेश देता है।
वक्ताओं ने कहा कि हमारे ऋषियों ने आकाश और ब्रह्मांड के रहस्यों पर चिंतन किया और आज भारतीय वैज्ञानिक उसी आकाश की ओर आधुनिक तकनीक के साथ अंतरिक्षयान भेज रहे हैं। यह यात्रा जिज्ञासा से ज्ञान, ज्ञान से विज्ञान और विज्ञान से मानव कल्याण तक पहुंचने की यात्रा है।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर परमार्थ निकेतन ने आह्वान किया कि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक विज्ञान, तकनीकी नवाचार और आत्मनिर्भरता के साथ अंतरिक्ष के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छुए। जिस भारत ने कभी नक्षत्रों की गति को समझने का प्रयास किया था, वही भारत आज अंतरिक्ष की नई सीमाएं निर्धारित कर रहा है। यह केवल चंद्रमा तक पहुंचने की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की चेतना और संभावनाओं के क्षितिज के विस्तार का प्रतीक है।
